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साहित्यशास्त्र अवधारणा परिभाषा कोश (हिंदी-हिंदी)
Definitional Dictionary of Concepts in Poetics (Hindi-Hindi)
[in progress]
(473 words)

शब्द-संग्रह निर्माता
वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग (Commission for Scientific and Technical Terminology)
हिंदी के ४७३ मूल शब्दों को परिभाषित किया गया है
Hindi equivalents for 473 base words in Hindi have been defined

प्रभारी अधिकारी
Dr. Ashok N. Selwatkar
डॉ. अशोक एन. सेलवटकर (ans.cstt@gmail.com)
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काव्यानंद"काव्यानंद को भिन्न-भिन्न आचार्यों ने भिन्न-भिन्न विशेषणों से अभिहित किया है । नाट्यशास्त्रकार ने उसे लौकिक मानते हुए ‘यथाहि नानाव्यंजन...’ कहकर स्पष्ट किया है । भट्टनायक ने इसे प्रकाशानंदसंवित् कहा है, जो सम्यक् ज्ञान से उत्पन्न आनंद है । रस को ‘ब्रह्मानंदसहोदर’ या ‘अलौकिक’ मानने के मूल में उसकी ‘विलक्षता’ है । अभिनवगुप्त के अनुसार –“रसना च बोधरुपैव किंतु बोधान्तरेभ्यो लौकिकेभ्यो विलक्षणैव ।” (अभिनवभारती, षष्ठ अध्याय) काव्यानंद की विलक्षणता इसलिए भी है कि व्यावहारिक धरातल पर शोक, क्रोध, भय, घृणा आदि भाव दुखात्मक हैं, जबकि रस-रूप में आनंददायक । इसका समाधान यह है कि सुख-दुख इंद्रियानुभूति के विषय हैं, जबकि रस या आनंद मानसिक है । अभिनवगुप्त इसे ‘चिद्-विशिष्ट इत्यादि की अनुभूति कहते हैं, जबकि पंडितराज जगन्नाथ ‘रत्याद्यवच्छिन्ना चिदेव रस:’ कहकर उसे पूर्णतः मानसिक मानते हैं, जो विभिन्न भावों से मुक्त होकर आत्मचैतन्य की स्थिति में अनुभूत होता है । धनंजय भी इसी का समर्थन करते हैं –“स्वाद: काव्यार्थसंभेदादात्मानंदसमुद्भव: ।” (दशरूपक, 4.43) आचार्य विश्वनाथ कहते हैं कि अलौकिक होते हुए भि रस सहृदयों के द्वारा वास्तविक रूप में आस्वादित होता है-“तस्मादलौकिक: सत्यं वेद्य: सहृदयैरयम् । प्रमाणं चर्वणैवात्र स्वाभिन्ने विदुषां मतम् ॥” (साहित्यदर्पण, 3.26)"प्रतिपुष्टि
काव्यसामान्यतः ललित वाड्.मय मात्र काव्य है। भारतीय आचार्य कवि-कर्म या कवि-व्यापार को काव्य कहते हैं। आचार्य भट्टतौत कहते हैं—‘तस्य कर्म स्मृतं काव्यम्’। आचार्य कुंतक भी यही घोषित करते हैं— ‘कवेः कर्म काव्यम्’। यह कवि-कर्म या कवि-व्यापार ही वक्रोक्ति है। वक्रोक्ति कवि-कर्म-कौशल का परिणाम होती है और मुख्यतः कवि-प्रतिभा-प्रसूत होती है।उन्होंने काव्य को स्पष्ट शब्दों में परिभाषित भी किया है— शब्दार्थौ सहितौ वक्रकविव्यापारशालिनि। बन्धे व्यवस्थितौ काव्यं तद्विदाह्लादकारिणि।। [जिसमें शब्दार्थ का साहित्य हो, जो वक्र कवि-व्यापार से युक्त और बंध में व्यवस्थित हो तथा काव्य-मर्मज्ञों के आह्लाद का कारण हो; वह काव्य है।] आचार्य अभिनवगुप्त ने भी वक्रोक्ति को कवि-व्यापार का पर्याय माना है, जबकि आचार्य भामह के अभिमत में तो केवल वक्रोक्ति ही काव्य होती है। इस काव्य को द्विविध माना गया है— श्रव्य और दृश्य। श्रव्य काव्य के प्रबंध और मुक्तक दो प्रधान भेद हैं।दृश्य काव्य को रूपक भी कहते हैं और इसके दस भेद हैं। इसलिए इन्हें दशरूपक नाम से भी जाना जाता है।कालांतर में नाटकादि दशरूपक ‘नाट्य’ के रूप में ‘काव्य’ से स्वतंत्र प्रतिष्ठा प्राप्त कर लेते है।प्रतिपुष्टि
काव्य दोष‘दोष’ रसानुभूति में अवरोधक, बाधक एवं विलंबक होता है । वह काव्य का विघातक तत्त्व होता है । इसीलिए आचार्य वामन ने ‘दोष’ को गुण का विपर्यय कहा है - ‘गुणविपर्ययात्मानो दोषा: । 1,1,1 (काव्यालंकारसूत्रवृत्ति: - वामन ) । दोष काव्य सौंदर्य को हानि पहुँचाते हैं । दोष रस का अपकर्षक होता है और मुख्य अर्थ को नुकसान पहुँचाता है । काव्य में दोष वहाँ माना जाता है, जहाँ लोक और शास्त्र के विरुद्ध शब्द, अर्थ और रसानुभूति की स्थिति हो । मम्मट ने दोष देखने के तीन आधार निश्चित किये- शब्द, अर्थ और रस दोष । इन्हीं दोषों के अंतर्गत समस्त दोषों (न्यूनपदत्व, क्लिष्ट, च्युतसंस्कृति आदि ) को मान लिया जाता है । काव्य में कभी-कभी दोष की उपस्थिति सौंदर्यवर्धक भी साबित होती है ।प्रतिपुष्टि
काव्य गुणगुण काव्य के विधायक तत्त्व होते हैं । आचार्य वामन गुण को काव्य का नित्य, आंतरिक और सारभूत तत्त्व मानते हैं । गुण काव्य की शोभा बढ़ाने वाले धर्म हैं - ‘काव्य शोभाया: कर्तारो धर्मा गुणा: । 3,1,1 (काव्यालंकारसूत्रवृत्ति: - वामन ) । ये शब्द और अर्थ पर आधारित होते हैं । गुण को दोष का विपर्यय भी कहा जाता है । मम्मट ने गुण को रस का उत्कर्षक धर्म कहा है । गुण और रीति में अन्योन्याश्रित संबंध होता है । वामन गुणों की संख्या बीस मानते हैं । दस शब्द गुण (ओज, प्रसाद, श्लेष, समता, समाधि, माधुर्य, सौकुमार्य, उदारता, अर्थ-व्यक्ति, कान्ति ) और दस अर्थ गुण (शब्द गुण नाम यथावत) । इनमें मुख्यतः तीन माने जाते हैं- माधुर्य, ओज और प्रसाद । इन्हीं तीनों में सभी गुणों को समाहित किया जाता है । माधुर्य गुण में शृंगार रस, करुण रस की स्थिति के कारण चित्त द्रवीभूत हो जाता है । ओज गुण में वीर रस, रौद्र के कारण दीप्त और प्रसाद गुण में सभी रसों के कारण व्यापकत्व की स्थिति होती है ।प्रतिपुष्टि
काव्य हेतु काव्य हेतु का सामान्य अर्थ है- काव्य के कारण या काव्य के साधन । काव्य हेतु तीन माने जाते हैं- प्रतिभा, व्युत्पत्ति और अभ्यास । प्रतिभा के लिए ‘शक्ति’ शब्द का भी प्रयोग आचार्यों ने किया है । ‘प्रतिभा’ के संबंध में आचार्य भट्टतौत का कथन है- ‘प्रज्ञा नवनवोन्मेषशालिनी प्रतिभा मता । यह साहित्य रचने वाली मुख्य शक्ति है । व्युत्पत्ति का अर्थ है- बहुज्ञता या लोक-शास्त्र का ज्ञान । अभ्यास अर्थात् बार-बार की आवृत्ति । तीनों के समन्वय से उत्कृष्ट काव्य रचना होती है ।प्रतिपुष्टि
काव्यशास्त्र काव्य का अध्ययन करने वाली विद्या के रूप में काव्यशास्त्र के लिए प्राचीन नाम ‘अलंकारशास्त्र’प्रसिद्ध रहा है । इस विद्या का अध्ययन करने वाले विद्वानों की संज्ञा ‘आलंकारिक’ प्रचलित रही है । आज भी संस्कृत के बहुत से पंडित ‘अलंकारशास्त्र’ और ‘आलंकारिक’संज्ञा का प्रयोग करते हैं । दंडी को छोड़कर भामह से लेकर रुद्रट तक आचार्यों के ग्रंथों के नाम- काव्यालंकार (भामह), काव्यालंकारसूत्रवृत्ति (वामन), काव्यालंकारसारसंग्रह (उद्भट), काव्यालंकार (रुद्रट) आदिप्रमाण-स्वरूप देखे जा सकते हैं । परवर्ती आचार्य कुंतक ने भी अपने ग्रंथ ‘वक्रोक्तिजीवितम्’ के लिए काव्यालंकार संज्ञा विकल्प से प्रयुक्त की है । वामन ने तो अलंकार को काव्य के सौंदर्य का पर्याय ही माना था । उनके लिए अलंकार काव्य के सौंदर्य के समग्र प्रभाव का वाचक था ।किंतु, इस विद्या के परवर्ती विकास-क्रम में रसध्वनिवादियों के प्रभाव से अलंकार का अर्थ बहुत संकुचित हो गया । वह काव्य-शोभा के व्यापक अर्थ की जगह उपमा, रूपक आदि अभिव्यक्ति प्रकारों तक ही सीमित माना जाने लगा । इसलिए ‘अलंकारशास्त्र’ संज्ञा का प्रयोग भी सीमित होता गया । बाद के आचार्यों के ग्रंथों के नाम उनकी अंतर्वस्तु के अनुसार बदलते गये हैं; जैसे- ध्वन्यालोक, व्यक्तिविवेक, औचित्यविचारचर्चा आदि । रुद्रट के बाद काव्यशास्त्र के लिए विकल्प के रूप में ‘साहित्य’ शब्द का प्रयोग होने लगता है; यद्यपि इसके बीज भामह के ‘शब्दार्थौ सहितौ काव्यम्’ में ही विद्यमान थे । राजशेखर ने तो ‘साहित्य विद्या’ का, अन्य विद्याओं के साथ, स्पष्ट उल्लेख किया है । मुकुलभट्ट, प्रतिहारेंदुराज, क्षेमेंद्र आदि ने इस विद्या के लिए ‘साहित्य’ का ही प्रयोग किया है । कुंतक और भोज के यहाँ भी ‘साहित्य’ प्रमुखता से विवेचित है । रुय्यक ने ‘साहित्य-मीमांसा’ नाम से स्वतंत्र ग्रंथ की रचना ही की है । आगे चलकर विश्वनाथ ने भी‘साहित्यदर्पण’ लिखा । आरंभ में साहित्य पद काव्यशास्त्र का वाचक था, पर काल-क्रम से यह 'काव्य' का पर्याय हो गया और 'काव्यशास्त्र' के लिए 'साहित्यशास्त्र' अथवा 'साहित्य मीमांसा' पद चल पड़ा । काव्यशास्त्र के लिए एक और प्रचलित नाम ‘काव्यलक्षण’ दिखायी पड़ता है । ‘काव्यलक्षण’ के अतिरिक्त और ‘काव्यालंकार’ से पहले, इसके लिए एक और संज्ञा ‘क्रियाकल्प’का प्रयोग मिलता है । ‘क्रियाकल्प’ का अर्थ ‘काव्यकरण की विधि या नियम’ किया गया है । विद्वानों का मत है कि ‘क्रियाकल्प’ वस्तुतः ‘काव्यक्रियाकल्प’ है । ‘क्रियाकल्प’ का उल्लेख सबसे पहले वात्स्यायन के ‘कामसूत्र’ (तीसरी शताब्दी ई.) की कला-सूची में दिखायी पड़ता है । वाल्मीकि के रामायण के उत्तरकांड में भी ‘क्रियाकल्पविद्’ का प्रयोग है । इस तरह काव्यशास्त्र के लिए चार प्रमुख संज्ञाओं का प्रयोग रहा है- ‘क्रियाकल्प’,‘काव्यलक्षण’,‘अलंकारशास्त्र’ और ‘साहित्य’ अथवा 'साहित्यशास्त्र ।प्रतिपुष्टि
श्रव्य काव्यइंद्रियों के आधार पर काव्य के दो विभाजन किये जाते हैं – श्रव्य और दृश्य काव्य । श्रव्य काव्य का शैली की दृष्टि से तीन भेद- गद्य, पद्य और चंपू काव्य किया जाता है । गद्य का अनेक रूपों – उपन्यास, कहानी, जीवनी, आत्मकथा, निबंध, आदि में विभाजन किया गया । समस्त आधुनिक गद्य विधाएँ इसी के अंतर्गत आती है । पद्य का छंद की दृष्टि से दो विभाजन – प्रबंध और मुक्तक माना जाता है ।प्रतिपुष्टि
प्रबंध काव्यप्रबंध काव्य अर्थात् विशेष बंध से विन्यस्त काव्य । प्रबंध में कथानक की पूर्वापर तारतम्यता आदि से अंत तक चलती है । उसके कथानक छंदों से शृंखला में बंधे होते हैं । उसमें काव्य में संपूर्ण प्रभाव को देखा जाता है । प्रबंध में मार्मिक स्थलों की पहचान, देशकाल, प्रकृति आदि का सूक्ष्म ज्ञान अपेक्षित होता है । आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने प्रबंध को ‘विस्तृत वनस्थली’ कहा है | प्रबंध के दो भेद होते हैं – महाकाव्य और खंड काव्य |प्रतिपुष्टि
महाकाव्य‘महाकाव्य’ प्रबंध काव्य का प्रधान भेद है । ‘महाकाव्य’ में किसी महान चरित्र का जीवन विस्तृत और व्यापक फ़लक पर अभिव्यक्त होता है । आचार्य भामह ने महाकाव्य का सर्वप्रथम लक्षण-निरूपण किया है – सर्गबंधो महाकाव्यं महतां च महच्च यत् । अग्राम्यशब्दमर्श्यं च सालंकार सदाश्रयम ॥ महाकाव्य संबंधी सभी आचार्यों के मतों का सार निम्नलिखित है- सर्गबद्धता, महान् चरित्र, वस्तु, व्यापार और परिवेश, भाव व्यंजना और प्रौढ़ भाषा शैली और महत् उद्देश्य । रामायण, महाभारत, रामचरितमानस, कामायनी सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य माने जाते हैं । महाकाव्य के दो भेद होते हैं– परंपरानिष्ठ महाकाव्य और परंपरामुक्त महाकाव्य । रामस्वरूप चतुर्वेदी ने ‘लंबी कविता’ को महाकाव्य का विकसित रूप माना है ।प्रतिपुष्टि
खंड काव्यप्रबंध काव्य का दूसरा महत्त्वपूर्ण भेद है– खंड काव्य । महाकाव्य में समग्र जीवन का चित्रण होता है, जबकि खंड काव्य में खंड जीवन का । खंड काव्य में संक्षिप्त कथानक, कथा संगठन में प्रभावान्विति, चरित्र के भावाभिव्यंजन पक्ष पर बल और उद्देश्य होता है । इसी आधार पर खंड काव्य के सात तत्त्व- कथानक, पात्र या चरित्र, संवाद, रस या भावाभिव्यंजन, देशकाल, उद्देश्य और शैली माने जाते हैं । रचना-विधान की दृष्टि से खंड काव्य के दो भेद किये जाते हैं- एकार्थ खंड काव्य और अनेकार्थ खंड काव्य । हिंदी के उद्धवशतक, रश्मिरथी, कुरुक्षेत्र, आत्मजयी आदि प्रसिद्ध खंड काव्य हैं ।प्रतिपुष्टि
मुक्तक काव्यजिसकी कथा में पूर्वापर का अभाव हो, छंद स्वतंत्र अर्थ देने वाला हो, उसे मुक्तक कहते हैं । अग्निपुराण में कहा गया है- “मुक्तकं श्लोक एवैकश्चमत्कारक्षमः सताम्” (एक छंद में पूर्ण अर्थ और चमत्कार प्रकट करने वाला अनिबद्ध काव्य मुक्तक कहलाता है ।) मुक्तक के मुख्यतः दो भेद माने जाते हैं- गेय और पाठ्य । हिंदी में गेय मुक्तकों की समृद्ध परंपरा रही है । विद्यापति पदावली, कबीर के दोहे, विनय पत्रिका, सूर का साहित्य, बिहारी सतसई, आदि । आधुनिक विधाओं में गीत-नवगीत एवं ग़ज़ल भी गेय परंपरा में ही है । पाठ्य की दृष्टि से मुक्त छंद के अंतर्गत नयी कविता और समकालीन हिंदी की बहुतायत कविताएँ आती है ।प्रतिपुष्टि
काव्य-प्रयोजनकाव्य-प्रयोजन का सामान्य अर्थ है – काव्य का उद्देश्य । आचार्य मम्मट ने समस्त काव्य-प्रयोजनों को एक ही कारिका में प्रस्तुत किया – काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये । सद्यः परनिर्वृतये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे ॥ काव्य से यश, अर्थ, व्यावहारिक ज्ञान, अमंगल का नाश और मंगल का विधान, आनंद की प्राप्ति तथा कांता के समान उपदेश की प्राप्ति होती है । यश एवं अर्थ का संबंध रचनाकार के पक्ष से और आनंद तथा कांता सम्मित आस्वादक के पक्ष से है । अमंगल का नाश और व्यावहारिक ज्ञान उभयनिष्ठ है । इसमें से प्रथम चार गौण और अंतिम दो मुख्य प्रयोजन माने गये । इसके अतिरिक्त काव्य का उद्देश्य पुरुषार्थ चतुष्ट्य- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को भी माना गया है ।प्रतिपुष्टि
काव्य पुरुषकाव्य पुरुष अर्थात् साहित्य पुरुष । काव्य पुरुष की माँ देवी सरस्वती मानी जाती हैं । वह छंदोबद्ध वाणी से युक्त पुरुष है । राजशेखर ने एक रूपक के माध्यम से काव्य पुरुष का निरूपण किया है । शब्द और अर्थ ‘काव्य पुरुष’ के शरीर हैं तथा संस्कृत भाषा मुख । प्राकृत, अपभ्रंश, पिशाच एवं मिश्र भाषाएँ क्रमशः भुजाएँ, जंघा, चरण एवं वक्ष स्थल हैं । सम, प्रसन्न, मधुर, उदार एवं ओजस्वी उसके गुण हैं । काव्य पुरुष की आत्मा रस है । छंद रोम तथा अलंकार अलंकरण है । काव्य पुरुष की पत्नी साहित्य विद्या या वधू है ।प्रतिपुष्टि
कथानक/काव्य रूढ़िकथानक के विकास के लिए गति और नाटकीयता के माध्यम से संभावना आधारित कथा ही कथानक रूढ़ि है । ऐतिहासिक तथ्य में भी संभावना पक्ष पर बल देकर कथानक रूढ़ि के रूप में विकसित किया जाता है । इसका प्रयोग पृथ्वीराज रासो, पद्मावत, रामचरितमानस जैसे हिंदी के महाकाव्यों में हुआ है । शुक-शुकी संवाद, स्वप्न में प्रिय का दर्शन पाकर आसक्त होना, मुनि का शाप आदि अनेक कथानक रूढ़ियों की व्याख्या हजारीप्रसाद द्विवेदी ने किया है । भारतीय साहित्य, लोक साहित्य में भी कथानक रूढ़ियों का बहुतायत प्रयोग मिलता है ।प्रतिपुष्टि
चंपू काव्य श्रव्य काव्य का तीसरा भेद- चंपू काव्य है । गद्य-पद्य मिश्रित काव्य को चंपू कहते हैं । आचार्य विश्वनाथ ने कहा भी है- ‘गद्यपद्यमयं काव्यं चम्पूरित्यमिधीयते |’(साहित्य दर्पण – ६/३३६ ) | कथा स्रोत के आधार पर चम्पू काव्य का निम्मलिखित वर्गीकरण किया जा सकता है – रामायणमूलक, महाभारतमूलक, पुराण मूलक,जैन आख्यानमूलक, महापुरुषचरित्रमूलक, यात्रामूलक, दर्शनमूलक चम्पू काव्य | नलचम्पू और रामायण चम्पू प्रसिद्द चम्पू काव्य है |प्रतिपुष्टि
उत्तम काव्यउत्तम काव्य को ध्वनिकाव्य भी कहा गया है ।ध्वनि काव्य में वाच्य और अभिव्यंग्य दो अर्थ होते हैं। हालाँकि, दोनों में अभिव्यंग्य अर्थ ही प्रधान होता है। काव्यप्रकाश में मम्मट ने इसका लक्षण इस प्रकार वर्णित किया है: 'इदमुत्तममतिशयिनि व्यङ्ग्ये वाच्याद् ध्वनि: बुधै: कथित:’। इसकी वृत्ति मम्मट लिखते हैं - ( इदमिति काव्यम्। बुधैर्वैयाकरणैः प्रधानभूतस्फोटरूपव्यङ्ग्यव्यञ्जकस्य शब्दस्य ध्वनिरिति व्यवहारः कृतः, ततस्तन्मतानुसारिभिरन्यैरपि न्यग्भावितवाच्यव्यङ्ग्यव्यञ्जनक्षमस्य शब्दार्थयुगलस्य। अर्थात̖ बुध (वैयाकरणों ) ने प्रधान रूप से स्फोट रूप व्यंग्य अर्थ की प्रतीति कराने में समर्थ शब्द के लिए ध्वनि इस पद का प्रयोग किया है । उसके बाद उन वैयाकरणों के मत का अनुसरण करने वाले साहित्यशास्त्र के आचार्यों ने भी वाच्यार्थ को गौण बना देने वाले व्यंग्यार्थ की अभिव्यक्ति कराने में समर्थ शब्द और अर्थ दोनों के लिए ध्वनि पद का प्रयोग आरम्भ किया । आचार्य मम्मट उत्तम काव्य के उदाहरण के रूप में निम्न पद्य प्रस्तुत करते हैं - निःशेषच्युतचन्दनं स्तनतटं निर्मृष्टरागोऽधरो नेत्रे दूरमनञ्जने पुलकिता तन्वी तवेयं तनुः। मिथ्यावादिनि दूति बान्धवजनस्याज्ञातपीडागमे वापीं स्नातुमितो गतासि न पुनस्तस्याधमस्यान्तिकम् ।।का.प्र.सू.2।। अत्र तदन्तिकमेव रन्तुं गतासीति प्राधान्येनाधमपदेन व्यज्यते।।) द्रष्टव्य ,काव्यप्रकाश सूत्र । उत्तमकाव्य या ध्वनि काव्य में वाच्य अर्थ की तुलना में ध्वनि के अर्थ की प्रधानता अर्थात̖ अधिक चमत्कारी होने से उत्तम काव्य के नाम से भी जाना जाता है। आनंदवर्धन के अनुसार, जिस अर्थ में अधिक सौंदर्य होता है, वह अर्थ प्रधान हो जाता है। ध्वनि के उदाहरण इस प्रकार हैं: “एवंवादिनि देवर्षौ पार्श्वे पितुरधोमुखी। लीलाकमलपत्राणि गणयामास पार्वती” ॥(कुमारसम्भवस्य षष्ठ सर्ग) देवर्षि नारद के ऐसा कहने पिता हिमालय के बगल में बैठी पार्वती हाथ में पकड़े हुए कमाल की पंखुड़ियों को गिनने लगी ।यह श्लोक कुमारसंभवम् के छठे सर्ग में है।, देवर्षि नारद अन्य ऋषियों के साथ, भगवान शिव के अनुरोध पर, पर्वतराज हिमालय के घर गए और उन्हें बताया कि 'भगवान̖ शिव विवाह के लिए पार्वती को चुनेंगे। जब देवर्षि नारद इस प्रकार हिमालय से बात कर रहे थे, देवी पार्वती, जो हिमालय के पास खड़ी थीं,लज्जा से अधोमुखी अपने मनोरंजन के लिए अपने हाथ में पकड़े हुए कमल के फूल की पत्तियों को गिन रही थीं। इस वाक्यांश में, लज्जा का अभिव्यंजक अर्थ धीरे-धीरे मुख्य रूप अर्थ से अधिक चमत्कारकारी हो जाता है। अतः यह ध्वनिकाव्य का एक उदाहरण है। इस प्रकार यह समझना चाहिए कि उत्तम (ध्वनि) काव्य में वाच्य अर्थ अप्रासंगिक होता है और अभिव्यंजक अर्थ (ध्वन्यर्थ) प्रधान होता है। ध्वनि काव्य ही उत्तमकाव्य नाम से कहा गया है ।प्रतिपुष्टि
चित्रकाव्यआनन्दवर्धन के अनुसार रस,भाव आदि से रहित और व्यंग्यार्थ कि प्रकाशन शक्ति से शून्य काव्य केवल वाच्य और वाचक के वैचित्र्यमात्र के आश्रय से उपनिबद्ध होकर जो आलेख्य (चित्र) की भाँति प्रतीत हो,वह "चित्रकाव्य" है। यह शब्दचित्र और अर्थचित्र भेद से दो प्रकार का होता है। (ध्व.3/41-42 ) काव्यप्रकाश का अवरकाव्य (अधम काव्य) ही चित्रकाव्य है शब्दचित्रमव्यंग्यमवरम̖ स्मृतम̖। इसमें रस-भावादि काव्य के मर्मस्पर्शी तत्वों के न रहने से अनुभूति की गहराई का अभाव रहता है; अनुप्रास, यमक या उपमा, रूपक आदि की कोरी शब्दार्थ क्रीड़ा ही मुख्य हो उठती है। शब्दों या अर्थों को लेकर खिलवाड़ या व्यायाम ही यहाँ अधिकतर अभिप्रेत है। जहाँ (स्फुट व्यंग्य के अभाव में) अनुप्रास, यमकादि शब्दालंकारों या ओजप्रसादादि गुणव्यंजक वर्णों से शब्दगत चमत्कार प्रदर्शित होता है, उसे शब्दचित्र कहते हैं और जहाँ उपमा-उत्प्रेक्षादि ऊहात्मक अर्थालंकारों से अर्थगत क्रीड़ापरक चमत्कार लक्षित होता है, उसे अर्थचित्र कहते हैं। इनमें भावपूर्ण एवं रमणीयार्थ की अवहेलना करते हुए क्रीड़ावृत्ति पर ही बल दिया जाता है। शब्दचित्र में वर्णाडंबर के माध्यम से भी चित्रसर्जन होता है । दंडी ने स्वर-स्थान-वर्ण-नियम-कृत वैचित्र्यमूलक कुछ शब्दालंकारों की चर्चा करते हुए दो ,तीन, चार, व्यंजन तथा स्वर आदि वाले चित्रकाव्यभेद का भी निर्देश दिया है। इससे भी आगे बढ़कर शब्दक्रीड़ा का एक विशिष्ट प्रकार है जिसे प्राय: चित्रबंधकाव्य कहते हैं और जिसमें खड्ग, पद्म, हल आदि की रेखाकृतियां में बद्ध, सप्रयास गढ़े पद्य मिलते हैं। हृदयस्पर्शिता से बहुत रहित होने से इन्हें काव्य नहीं पद्य मात्र कहना चाहिए। रुद्रट आदि ने इसे ही "चित्रालंकार" नामक शब्दालंकार का एक भेद कहा है। "अर्थचित्र" में मुख्यत: ऊहामूलक, कष्टकल्पनाश्रित, क्रीड़ापरक एवं असहज अर्थवैचित्र्य मात्र की उद्भावना की जाती है। अत: वे भी सहृदय हृदय के संवादभागी न होकर विस्मयपूर्ण कुतूहल के सर्जक होते हैं। "प्रहेलिका" और "दुष्ट प्रहेलिका" के भेद भी चित्रकाव्य ही हैं। इनसें भी सप्रयास शब्दार्थ क्रीड़ा से कुतूहलसर्जना की जाती है। तात्पर्य यह कि चित्रकाव्य की प्रेरणा कवि के भावाकुल अंतस्तल से नहीं वरन् क्रीड़ापूर्ण एवं वैचित्र्यसूचक कुतूहलवृत्ति से मिलती है। अत: कविहृदय की भावसंपत्ति से सहज विलास का उन्मेष यहाँ नहीं दिखाई देता। बंध-चित्रकाव्य में छंद की ऐसी रचना जिसकी कुछ विशिष्ट नियमों के अनुसार उसकी पंक्तियों के अक्षर बैठाने से किसी विशेष प्रकार की आकृति या चित्र बन जाय। जैसे-अश्वबंध, ख़ड्गबंध, छत्र-बंध आदि। यथा केशवदास का एक सवैया लीजिये :मां सस मोह सजै बन बीन, नवीन बजै सह मोस समा।मार लतानि बनावति सारि, रिसाति वनाबनि ताल रमा ॥मानव ही रहि मोरद मोद, दमोदर मोहि रही वनमा।माल बनी बल केसबदास, सदा बसकेल बनी बलमा ॥ इस सवैया की किसी भी पंक्ति को किसी ओर से भी पढिये, कोई अंतर नहीं पड़ेगा।सदा सील तुम सरद के दरस हर तरह खास।सखा हर तरह सरद के सर सम तुलसीदास॥प्रतिपुष्टि
मध्यम काव्य या गुणीभूत व्यंग्यजहाँ पर वाच्यार्थ की तुलना में व्यंग्यार्थ प्रधान या अधिक महत्वपूर्ण न होकर गौण होता है,वहाँ पर 'गुणीभूत व्यंग्य' माना जाता हैं।मम्मट ने इसे मध्यम काव्य की संज्ञा दी है । ‘अतादृशी गुणीभूतव्यङ्ग्यम̖ व्यङ्ग्ये तु मध्यमम̖’ (का.प्र.सू.3) पंडितराज जगन्नाथ इसे उत्तम काव्य मानते हैं, क्योंकि व्यंग्यार्थ का अस्तित्व इस काव्य में रहता है। चमत्कार चाहे व्यंग्यार्थ में हो या चाहे वाच्यार्थ में उसका अस्तित्व होने से काव्य उत्तम कोटि का होता है। मम्मट के उत्तम काव्य को वे उत्तमोत्तम काव्य की संज्ञा देते हैं । जबकि मम्मट व्यंग्य के गुणीभूत अर्थात गौण होने के कारण इसे गुणीभूत व्यंग्य या मध्यम काव्य कहते हैं । इसके 'आठ' (८) भेद बताए गए हैं (1) अगूढ़ व्यंग्य(2) अपरांग व्यंग्य (3) अस्फुट व्यंग्य (4) असुंदर व्यंग्य (5 )संदिग्धप्राधान्य व्यंग्य (6) तुल्यप्राधान्य व्यंग्य (7)काक्वाक्षिप्त व्यंग्य (8)वाच्यसिद्ध्यंग व्यंग्य । जैसे -ग्रामतरुणˑ तरुण्या नववञ्जुल मंजरीसनाथकरम̖। पश्यंत्या भवति मुहुर्नितराम̖मलिना मुखच्छाया॥ वेतस लता की ताजी तोड़ी हुई मंजरी को हाथ में लिए हुए ग्राम के युवक को देखकर तरुणी के मुख की कान्ति मलिन होती जा रही है । यहाँ पर वेतस लतागृह में मिलने का स्थान निर्धारित हुआ था लेकिन नायिका वहाँ नहीं पहुँची। नायक वहाँ जाकर वेतस की टहनी तोड़कर लाया,ताकि बता सके कि वह वहाँ गया था । यह व्यंग्य अर्थ है,लेकिन इस व्यंग्यार्थ कि अपेक्षा वाच्यार्थ ही अधिक चमत्कार उत्पन्न करता है । अत:यह मध्यम काव्य है । हिन्दी साहित्य में इनके उदाहरण देखे जा सकते हैं -(1) अगूढ़ व्यंग्य: जहाँ व्यंग्यार्थ वाच्यार्थ के समान स्पष्ट प्रतीत होता है उसे 'अगूढ़ व्यंग्य' कहते हैं। गोधन गजधन बाजीधन, और रतनधन खान।जब आवत संतोष धन, सब धन धूरि समान। यहाँ पर 'सब धन धूरि समान' में मुख्यार्थ की बाधा है, परंतु अर्थ यह निकलता है कि, सब धनों का महत्त्व समाप्त हो जाता है, जब सन्तोष आ जाता है। व्यंग्यार्थ यह निकलता है कि सन्तोष ही आवश्यक है, उसके सामने और धन व्यर्थ हैं। यह व्यंग्यार्थ अत्यंत स्पष्ट हैं।(2) अपरांग व्यंग्य: जहाँ पर रस,भाव,भावाभास आदि एक-दूसरे के अंग हो जाते हैं उसे 'अपरांग व्यंग्य' कहते हैं। डिगत पानि डिगुलात गिरि, लखि सब ब्रज बेहाल। कंप किसोरी दरस तें, खरे लजाने लाल।।" यहाँ पर सात्विक भाव 'कंप' द्वारा व्यंजित रति स्थायी या शृङ̖गार रस 'लज्जा' संचारी का अंग हो गया हैं। अतः अपरांग व्यंग्य हैं।(3) अस्फुट व्यंग्य:जहाँ पर व्यंग्य गूढ़ हो और बहुत प्रयत्न करने पर समझा जाए परंतु स्पष्ट न समझा जाए उसे 'अस्फुट व्यंग्य' कहते हैं।"खिले नव पुष्प जग प्रथम सुगंध के प्रथम वसन्त में गुच्छ गुच्छ ।" यहाँ पर वर्णन प्रकृति का लगता है।इससे यह व्यंग्यार्थ बड़ी कठिनाई से ही निकल पाता है की युवावस्था के आगमन में अनेक प्रकार की नवीन आशाएँ प्रकट हुई ।(4) असुंदर व्यंग्य: जहाँ पर वाच्यार्थ से निकलनेवाले व्यंग्यार्थ में कोई चमत्कार न हो, उसे 'असुंदर व्यंग्य' कहते हैं। यथा- बिहँग सोर सुनि सुनि समुझि,पछवारे की बाग। जाति परि पियरी खरी, प्रिया भरी अनुराग ।।" इस वाच्यार्थ में व्यंग्य है कि प्रिय से मिलने के लिए प्रिया अत्यंत व्याकुल है, जो वाच्यार्थ से भी स्पष्ट है और कोई चमत्कार नहीं रखता। (5) संदिग्धप्राधान्य व्यंग्य: जहाँ पर सन्देह बना रहे कि अर्थ में वाच्यार्थ प्रधान है अथवा व्यंग्यार्थ प्रधान है, उसे 'संदिग्धप्राधान्य व्यंग्य' कहते हैं। (6)तुल्यप्राधान्य व्यंग्य:जहाँ पर वाच्यार्थ और व्यंग्यार्थ दोनों ही समान चमत्कार के हों, उसे 'तुल्यप्राधान्य व्यंग्य' कहते हैं। यथा- आज बचपन का कोमल गात। जरा का पीला पात। चार दिन सुखद चाँदनी रात। और फिर अंधकार अज्ञात।। इस वाच्यार्थ का व्यंग्यार्थ यह हुआ कि सभी के दिन एक समान नहीं जाते। यह वाच्यार्थ के समान ही चमत्कारपूर्ण है,अतः यहाँ तुल्यप्राधान्य व्यंग्य हैं।(7 )काक्वाक्षिप्त व्यंग्य: जहाँ पर काकु (कण्ठगत विशेष ध्वनि) के द्वारा व्यंग्य प्रकट होता है, वहाँ पर 'काक्वाक्षिप्त व्यंग्य' होता है।यथा- हैं दससीस मनुज रघुनायक। जिनके हनुमान से पायक।। यहाँ पर काकू से यह व्यंग्यार्थ निकलता है कि राम मनुज नहीं हैं अतः 'काक्वाक्षिप्त व्यंग्य' हैं।(8)वाच्यसिद्ध्यंग व्यंग्य:जहाँ पर निकलनेवाले व्यंग्यार्थ से ही पूरे पद के वाच्यार्थ की सिद्धि होती है, उसे ही 'वाच्यसिद्ध्यंग व्यंग्य' कहते हैं।प्रतिपुष्टि
काव्यात्मा भारतीय साहित्यशास्त्र की परंपरा में ‘काव्यात्मा’ पर सर्वप्रथम विचार आचार्य वामन ने ‘रीति’ के संदर्भ में प्रस्तुत किया । उनका सूत्र है – ‘रीतिरात्मा काव्यस्य’ (काव्यालंकारसूत्रवृत्ति: - वामन ) । अर्थात् रीति ही काव्य की आत्मा है । इसका अभिप्राय यह हुआ कि शब्दार्थ रूपी शरीर में रीति रूपी आत्मा । आत्मा का मतलब काव्य के सार तत्त्व या प्राण तत्त्व से है । रीति के बाद तो ‘आत्मा’ की चर्चा रस, ध्वनि (काव्यस्यात्मा ध्वनि ), वक्रोक्ति (वक्रोक्ति जीवितम्), अलंकार एवं औचित्य जैसे सिद्धांतों में भी खूब हुई । इसका प्रभाव इतना बढ़ा कि ‘सिद्धांतों’ को ‘आत्मवादी’ और ‘देहवादी’ के रूप में वर्गीकृत किया जाने लगा ।प्रतिपुष्टि
गद्य काव्य‘गद्य काव्य’ को ‘गद्यगीत’ भी कहते हैं। कविता और गद्य के सम्मिश्रण से इस विधा का आविर्भाव माना जाता है। कथेतर विधा के रूप में ‘गद्य काव्य’ एक छोटी आधुनिक विधा है। इसमें अनुभूति की सघनता, सरसता, रमणीयता, संगीतात्मकता, सहज भाषा रहती है। गद्य काव्य में जहाँ एक तरफ दार्शनिकता, आध्यात्मिकता रहती है, वही लेखक के मन की उमंग भी संवेदना का रूप लेकर अभिव्यक्त होती है।प्रतिपुष्टि

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